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India

“है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब!
हमने दश्त-ए-इम्कां को एक नक़्श-ए-पा पाया”
ہے کہاں تمنا کا دوسرا قدم یا رب
ہمنے دشت امکاں کو ایک نقش پا پایا
**मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग़ खां ‘ग़ालिब’~ 27/12/1797- 15/02/1869**
बिला शिक़वा मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू अदब की तारीख़ के सबसे अच्छे शाइर हुए हैं। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो क़लाम वो 150 बरस पहले लिख गए हैं, वो आज भी ताज़ा है। ग़ालिब को जितनी बार पढ़ा जाए, लगता है पहली दफ़ा पढ़ रहे हैं।
आइए कूचा-ए-शेर-ओ-सुख़न के सरताज मिर्ज़ा ग़ालिब की एक महफ़िल में शिरक़त कीजिए, ग़ालिब से जुड़िये, महसूस कीजिए।
इस इवेंट में आपके लिए पेश होंगी ये चीज़ें:-
* ग़ालिब की ज़िन्दगी जो कि काफ़ी हद तक misinterpreted रही, पर उनकी शायरी के हवाले से एक बातचीत का दौर।
* ग़ालिब के क़लाम: उनकी ग़ज़लें, उनके लिखे सहरा, मर्सिया का recitation
* ग़ालिब के ख़ुतूत(letters) की reading और उसके साथ उनकी ग़ज़लों का एक musical session
* अंत में एक सेशन सामईन के लिए कि वो ग़ालिब का कोई क़लाम, उनसे जुड़ी कोई बात, कोई अनुभव साझा करें सबके साथ।
इस एक छोटी सी कोशिश में शामिल हो कर शायरी के सबसे अलग अंदाज से रू-ब-रू होइए कि
“हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं के ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयां और!”

